‘द कश्मीर फाइल्स’ के ‘किरदारों का कारनामा’

देश | PUBLISHED BY: MK-PARMOD | PUBLISHED ON: 02 JUL, 2022

द कश्मीर फाइल्स

द कश्मीर फाइल्स

नई दिल्ली। 

‘लोग कश्मीर को जन्नत कहते हैं, लेकिन इसे जहन्नुम बनाने वाले वहां के मासूम लोगों को मारकर भी जन्नत का ही ख्वाब देखते हैं’। द कश्मीर फाइल्स से 

कश्मीर के बाहर भी एक ‘कश्मीर’ जैसी दुनिया है। हालांकि यहां शैतानी का नंगा नाच तो नहीं होता लेकिन यहां भी लोगों के हकों को मारा जाता है और ताजा मिसाल में तो उन्हीं लोगों की शागिर्दी है जिन्होंने कश्मीरी पंडितों के हकों को मारने के खिलाफ उनकी गाथा को सुनहले परदे पर उतारा है।

यहां बात हो रही है उसी 'दी कश्मीर फाइल्स' और इसके किरदार अनुपम खेर, विवेक रंजन अग्निहोत्री की जिन्होंने कश्मीरी पंडितों के जुल्मों सितम को रुपहले पर्दे पर उतारकर दुनिया को ये दिखाने का प्रयास किया है कि वे इनके रहनुमा हैं लेकिन एक दूसरा कश्मीर भी जहां ये खलनायक के किरदार में दिखते हैं। 

कहना गैरजरूरी है कि ये कथन हमारे  नहीं हैं बल्कि ये बात तो वह कह रहे हैं जिन्होंने इन किरदारों की ओर से दिए दर्द को झेला है।
आशीष दुबे मूलतः उसी भदोही के रहने वाले हैं जहां फैले बाल मजदूरी के खिलाफ झंडा उठाने के लिए कैलाश सत्यार्थी को नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया था लेकिन दुबे तो 'द कश्मीर फाइल्स' के किरदारों के मकड़जाल में ऐसे उलझे कि उनकी खुद की मजदूरी को ही ये किरदार डकार गए, जैसा कि आशीष का कहना है।

आशीष रहने वाले तो भदोही के हैं लेकिन उनके जीवन का अधिकांश लमहा मुंबई की मायानगरी में ही गुजरा है। अपने मूल स्थल से भदोही से सातवीं करने के बाद उनकी शिक्षा दिक्षा लातुर, पूना व मुंबई में हुई। लेकिन मायापुरी की चमक-दमक को देखकर इन्होंने फिल्म से जुड़े कुछ कोर्स किए। 

कोरोना के कहर ने तो लोगों को बेरोजगार ही बना दिया था। इस बीच विवेक अग्निहोत्री ने लॉकडाउन के वक्त अगस्त 2020 के दौरान आशीष को फोन कर एक टॉक शो के लिए काम करने का ऑफर दिया। इसमें आशीष की भूमिका स्क्रिप्ट सुपरवाइजर के तौर पर थी। आशीष के मुताबिक इस काम में विशाल चतुर्वेदी भी अग्रिहोत्री के साथ थे। इस दौरान काम की बात तो की गई लेकिन अग्निहोत्री ने मजदूरी के लिए कोई राशि निश्चित नहीं की। 

कोरोना का काल जिस दौरान लोगों को काम मिलना मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन था, यह सोचकर आशीष ने भी पैसे के मुद्दे पर कोई बात नहीं की कि इतने बड़े लोग वाजिब मजदूरी तो देंगे ही। 

फिर क्या था कि आशीष काम पर जुट गए और दिन में सात घंटे इस प्रोजेक्ट पर देने लगे और उन्हें स्क्रिप्ट भी भेजने लगे। हर दिन फाइनल मिटरियल लगभग 30 पेज तक के होते थे। आशीष के मुताबिक उन्होंने इस प्रोजेक्ट के लिए 15 एपिशोड पर काम किया। फिर 6 सितंबर को आशीष ने अपनी मजदूरी के भुगतान के लिए विवेक अग्निहोत्री को एक मेल भेजा। लेकिन जवाब आज-कल के रूप में मिला जबकि इस काम के लिए 25 सितंबर से लेकर 15 अक्टूबर तक भोपाल में इसकी सूटिंग इसलिए हुई कि मध्य प्रदेश सरकार से इस प्रोजेक्ट पर सब्सिडी मिलने वाली थी। गौरतलब है कि अग्निहोत्री मध्य प्रदेश के ही निवासी हैं। 

अग्निहोत्री के उस प्रोजेक्ट में अनुपम खेर, अशोक पंडित, सतीश कौशिक व रुमी जाफरी भी शामिल थे। साथ ही यह काम पेशन एंड पसीन प्रोडक्शन के बैनर तले चल रहा था। 

एक बार विवेक ने फोन पर आशीष को बताया कि एक प्रोजेक्ट के लिए उनकी फीस 1.5 लाख की होगी। चूंकि आशीष के पास काम नहीं था, इसलिए उन्होंने सोचा कि चलो कुछ भी सही, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं सोचा था कि कुछ भी नहीं और कभी भी नहीं। विवेक ने तो एक बार आशीष को यहां तक कहा था कि वह उन्हें ‘द कश्मीर फाइल्स’ में भी काम देंगे जिस प्रोजेक्ट की गतिविधि दिसंबर 2020 में शुरु होने वाली थी। लेकिन ऐसा कभी नहीं हो सका और आशीष के पिछले काम का पैसा अग्निहोत्री के यहां अभी तक बाकी है। 

जब इस संवाददाता ने विवेक अग्निहोत्री का पक्ष जानना चाहा तो उन्होंने फोन ही नहीं उठाया। फिर इस संवाददाता ने उनके ह्वाट्सएप पर मैसेज किया तो उन्होंने जवाब दिया कि वह यूरोप में ट्रेवल कर रहे हैं और एक मोबाईल स्क्रीन शॉट भेजा जिसमें लिखा है कि इस मामले से उनका कुछ लेना देना नहीं है। फिर इस संवाददाता ने अनुपम खेर से बात करने का प्रयास किया लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया और मैसेज करने पर कहा कि उन्हें क्वेरी भेजी जाए। क्वेरी भेजने पर उन्होंने मैसेज भेजा कि इसके लिए अशोक पंडित से बात की जाए। हालांकि इस संवाददाता ने जब एक ऑडिओ क्लिप खेर को यह पूछते हुए भेजा कि यह उनकी आवाज है तो उन्होंने इसका कोई जवाब नहीं दिया। अशोक पंडित से भी संपर्क करने का प्रयास भी विफल ही गया क्योंकि एक बार उन्होंने फोन तो उठाया लेकिन फिर उन्होंने इसे डिसकनेक्ट कर दिया।

 

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