तड़प तड़प कर मरने के बाद भी कम नहीं हुई लखबीर की मुश्किलें, गांव की पंचायत ने किया ये फैसला, सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला  

16 Oct, 2021 | देश | garima times

नई दिल्ली। सिंघु बॉर्डर पर निहंगों की बर्बरता का शिकार हुए लखबीर सिंह की तड़प तड़प कर मरने के बाद भी मुश्किलें कम नहीं हो रही। अब उस के शव का तरनतारन जिले में स्थित उसके गांव चीमा में पहुंचने को लेकर विरोध शुरू हो गया है। ग्रामीणों के साथ पंचायत सदस्यों ने कहा कि जिस पर गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी का आरोप लगा है उसका अंतिम संस्कार गांव में नहीं होने देंगे। वहीं अब सत्कार कमेटी ने भी घोषणा कर दी है कि लखबीर का दाह-संस्कार सिख मर्यादा के साथ नहीं होने देंगे।

पत्नी जसप्रीत कौर तीनों बेटियों समेत ससुराल चीमा खुर्द पहुंची। उसने  कहा कि उसका पति कभी अकेला अमृतसर तक नहीं गया, उसे आखिर सिंघू बार्डर कौन ले गया, इसकी जांच होनी चाहिए। जसप्रीत ने कहा कि पति लखबीर शुरू से ही क्लीन शेव था। हत्या के मौके पर उसने वह कछेरा पहन रखा था, जो सिखों में केवल अमृतधारी व्यक्ति ही पहनता है।  जसप्रीत के छोटे भाई सुखचैन सिंह ने कहा कि इंटरनेट मीडिया पर कई तरह के भ्रम फैलाए जा रहे हैं। यह बात किसी को हजम नहीं हो रही थी। लखबीर भले ही नशे का आदी था लेकिन वह गुरु साहिब की बेअदबी जैसी नीच हरकत नहीं कर सका। नीच हरकत तो उसकी निर्मम हत्या करने वालों ने की है। लखबीर के पड़ोस में रहने वाली सविंदर कौर, कंवलजीत कौर ने कहा कि मामले की उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए। लखबीर पर धार्मिक बेअदबी करने का आरोप सरासर झूठा है। उसने कभी भी किसी ग्रामीण को तंग परेशान नहीं किया।

बता दें किसान आंदोलन स्थल पर जिस अमानवीय और बर्बर तरीके से लखबीर को मारा गया उसका सभी ने एकजुट होकर विरोध किया था। लखबीर पर आरोप थे कि उसने सिख धर्म के लोगों की आस्था को ठेस पहुंचाई है। इस बात को लेकर गांव के लोगों और पंचायत सदस्यों ने ऐलान किया है कि लखबीर का शव जब भी गांव में आएगा, विरोध करेंगे। सत्कार कमेटी ने भी अब विरोध की घोषणा कर दी है। सत्कार कमेटी ने कहा कि लखबीर के शव का सिख मर्यादा के साथ दाह-संस्कार नहीं होने दिया जाएगा। संस्कार से पहले कोई अरदास नहीं होगी। इतना ही नहीं पाठ भी नहीं रखा जाएगा और न ही अंतिम अरदास होगी।

पंचायत सदस्य सतनाम सिंह, सर्बजीत सिंह, समाज सेवक आशीष पाल सिंह चीमा, गुरदयाल सिंह, कंवलजीत सिंह, राजिंदर सिंह, रतन सिंह, जसपाल सिंह और सुखवंत सिंह ने विरोध जताते हुआ कहा कि वह नहीं चाहते कि शव गांव में आए। वह न ही लखबीर का दाह-संस्कार गांव में होने देंगे। प्रशासन यदि जबरदस्ती करने का प्रयास करेगा तो इसका पुरजोर विरोध करेंगे। सभी ने सामूहिक रूप से कहा कि लखबीर पर जो आरोप लगे हैं, वे शर्मसार करने वाले हैं। उसने गुरुग्रंथ साहिब की बेअदबी की है। वहीं पंचायत सदस्यों ने कहा कि इस बात की भी संभावना है कि उससे यह घटना किसी ने करवाई हो।

पंचायत सदस्य सतनाम सिंह ने बताया कि लखबीर ऐसा इंसान था, जिसे तरनतारन के अन्य गांवों का भी नहीं पता था। उसको मोहरा बनाकर सियासत खेली गई है। अगर उसने बेअदबी करनी ही होती तो वह गांव में ही बने गुरुद्वारा साहिब में भी कर सकता था। उधर, सिंघु बार्डर पर मारे गए लखबीर का शव सोनीपत के नागरिक अस्पताल की मोर्चरी से गांव चीमा के लिए निकल चुका है। देर दोपहर शव के गांव चीमा पहुंचने की उम्मीद है। अगर अब पंचायत सदस्य और ग्रामीण उसके शव का विरोध करते हैं तो गांव में विवाद बढ़ने की आशंका है।

वहीं अब इस मामले में करीब 15 दलित संगठनों ने राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग को एक ज्ञापन सौंपा है और दोषियों को कड़ी सजा देने की मांग की है।  अखिल भारतीय खटीक समाज, अखिल भारतीय बेरवा विकास संघ, धनक कल्याण संघ और दलित कर्मचारियों और पेशेवरों के अन्य संगठनों समेत 15 दलित सगंठनों ने राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष विजय सांपला को ज्ञापन सौंपा। उन्होंने आयोग से इस मामले की निष्पक्ष जांच होने और दोषियों को कड़ी सजा सुनिश्चित करने की मांग की है। दलित नेता मायावती ने सरकार से मृतक के परिजनों के लिए 50 लाख के मुआवजे तथा सरकारी नौकरी की मांग की है।

 

उधर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल की गई है। इस याचिका में दलित व्‍यक्ति की हत्‍या का जिक्र करते हुए शीर्ष अदालत से उस लंबित जनहित याचिका पर तत्काल सुनवाई करने की गुजारिश की गई है जिसमें दिल्ली की सीमाओं से प्रदर्शनकारियों को हटाने की गुहार लगाई की गई है। याचिका में दलील दी गई है कि भाषण और अभिव्यक्ति की आजादी जीने के अधिकार से ऊपर नहीं हो सकती है। स्वाति गोयल और संजीव नेवार ने वकील शशांक शेखर झा के जरिए अपनी लंबित जनहित याचिका में यह अंतरिम याचिका दाखि‍ल की है जिसमें कहा गया है कि यदि इन प्रदर्शनों को ऐसे ही चलते रहने दिया गया तो देश को बड़े पैमाने पर नुकसान होगा। याचिका में केंद्र सरकार को राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को सभी तरह के प्रदर्शन रोकने और महामारी खत्म होने तक एसे प्रदर्शनों की इजाजत नहीं देने को लेकर दिशा-निर्देश देने का अनुरोध किया गया है।

जनहित याचिका में कहा गया है जो प्रदर्शन गैरकानूनी है... और जिसमें मानवता विरोधी कृत्य देखने को मिल रहे हैं... ऐसे प्रदर्शन को जारी रखने नहीं दिया जा सकता है। याचिका में कहा गया है कि प्रदर्शनों में गणतंत्र दिवस पर ट्रैक्टर रैली के दौरान हिंसा, एक महिला से दुष्कर्म की वारदात और दशहरा के मौके पर लखबीर सिंह नाम के दलित व्‍यक्ति की हत्या जैसे गंभीर वारदातें देखी गई हैं। याचिका में यह भी कहा गया है कि कोरोना संकट के चलते त्योहारों के सीजन में भी जश्न मनाने, मंदिरों में जाने, स्कूल कालेज जाने पर प्रतिबंध है तो ऐसे प्रदर्शनों को इजाजत देना ठीक नहीं होगा। प्रदर्शनकारी अपने साथ देश के लाखों लोगों की जान खतरे में डाल रहे हैं। ऐसे में जब महामारी चल रही हो इतने लंबे आंदोलन को अनुमति नहीं दी जा सकती है। सार्वजनिक स्थानों पर लंबे समय से प्रदर्शन किया जाना सर्वोच्‍च अदालत के आदेशों का स्‍पष्‍ट उल्‍लंघन है। यह लोगों के जीने के अधिकार का भी अतिक्रमण कर रहा है।